Thursday, July 3, 2014

राह



राह कि मोड पर
डर कर मैं रुक गाय
बढ जाऊ या पीछे मुडू
सोच कर सहम गया

पीछे मेरा घर है
ओर उसमें छुपी यादे
आगे नया राह है
भरे हैं जिसमें वादे

आगे रास्ते में पत्थर हैं 
ओर हैं अंजनी रुकावते 
पीछे घर की पानह हैं 
ओर करवट बदलती राते

 आगे एक भोर है
चौन्धीया गयी जिसमे आंखे 
पीछे भरे दोपहर की
छाव की हैं आहें

रूह मेरी बोले मुझसे
डर मत, मैं साथ तेरे 
घर मेरा पुकारे मुझे 
कहे सौ सौ बाते 

पलटू मैं निगाह 
देखू आगे पीछे 
थक कर बैठू मैं 
पीपल के छाव नीचे 

आंखे भर आये 
ओर भारी होने लगे
जाब एक आवाज मेरे अंदर 
शोर मचाये, गूंजे

गंतव्य की तलाश
न हो निराश 
रास्ते का पत्थर 
था कभी चट्टान 

आंख खुली, आह भरी
राह धरी, बढ चली

सूरज के आने पर
मैं नजर अपनी बचाऊंगा 
छुपते छुपाते मै

आगे बढ़ जऊँगा

मंजिल जब पास है
न कोई हताश है
जब राह अगर साथ है
हमराही की बस चाह है

अकेले भी मै
आगे बढ़ जऊँगा
पर राह के अंत में
किसे गले लगाऊंगा?

ये ख्वाब मेरे 
आधे अधूरे भले
रोके न मुझे ये 
बस इतना फले

गंतव्य की तलाश
मैं नहीं निराश
रस्ते में पत्थर 
ओर मैं चट्टान