राह कि मोड पर
डर कर मैं रुक गाय
बढ जाऊ या पीछे मुडू
सोच कर सहम गया
पीछे मेरा घर है
ओर उसमें छुपी यादे
आगे नया राह है
भरे हैं जिसमें वादे
आगे रास्ते में पत्थर हैं
ओर हैं अंजनी रुकावते
पीछे घर की पानह हैं
ओर करवट बदलती राते
आगे एक भोर है
चौन्धीया गयी जिसमे आंखे
पीछे भरे दोपहर की
छाव की हैं आहें
रूह मेरी बोले मुझसे
डर मत, मैं साथ तेरे
घर मेरा पुकारे मुझे
कहे सौ सौ बाते
पलटू मैं निगाह
देखू आगे पीछे
थक कर बैठू मैं
पीपल के छाव नीचे
आंखे भर आये
ओर भारी होने लगे
जाब एक आवाज मेरे अंदर
शोर मचाये, गूंजे
गंतव्य की तलाश
न हो निराश
रास्ते का पत्थर
था कभी चट्टान
आंख खुली, आह भरी
राह धरी, बढ चली
सूरज के आने पर
मैं नजर अपनी बचाऊंगा
छुपते छुपाते मै
आगे बढ़ जऊँगा
मंजिल जब पास है
न कोई हताश है
जब राह अगर साथ है
हमराही की बस चाह है
अकेले भी मै
आगे बढ़ जऊँगा
पर राह के अंत में
किसे गले लगाऊंगा?
ये ख्वाब मेरे
आधे अधूरे भले
रोके न मुझे ये
बस इतना फले
गंतव्य की तलाश
मैं नहीं निराश
रस्ते में पत्थर
ओर मैं चट्टान
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